शनिवार, 16 जुलाई 2011

पं.बिरजू महाराज:कत्थक जिनके लिए नृत्य नहीं बल्कि साधना है...
 नगर निगम राजनांदगाँव के एपीआरओ सुनील अग्रहरि ने कत्थक सम्राट से उनके जीवन और उससे जुडे पहलूओं पर बातचीत की...राजनांदगाँव प्रवास पर आये कत्थक गुरू नर्तक एवम् शास्त्रीय गायक पंडित बिरजू महाराज के साक्षात्कार के अंश इस प्रकार हैं..

वातावरण में छाया हुआ अंधेरा धीरे-धीरे गहराता जा रहा था। आकाश में उजाले के साथ मधुर ध्वनि का नाद सुनाई दे रहा था। ध्वनि की आवाज क्रमश: तबले की आवाज में बदलने लगी। आवाज सुनकर मैं चौंक गया क्योंकि यह ताल तो मेरे पिताजी की प्रिय ताल थी। मैं हैरान सा इधर-उधर देख रहा था कि मेरे सामने सफेद चादर में लिपटी एक आकृति उभरने लगी। इस आकृति ने पास आकर मेरे पिता का रूप धारण कर लिया। पिताजी बैठे हुए तबला बजा रहे थे। मैं हैरान होकर देख रहा था कि पिताजी की तो मृत्यु हो गई है, यह कहां से आ गए ? तभी पिताजी की आवाज वातावरण में गूंजी। वह मुझसे कह रहे थे कि चल खडा हो जा। नृत्य के लिए तैयार हो, नृत्य कर। मैं यंत्रवत उनके आदेश का पालन कर रहा था। तभी अचानक मुझे चेतना आई और मैं सोचने लगा कि जो कुछ मैंने महसूस किया वह सपना था या हकीकत जिसमें मेरे पिता मेरा मार्गदर्शन कर रहे थे। यह आभास कुछ दिनों बाद फिर हुआ। मैंने देखा कि पिताजी कहीं जाने को तैयार हो रहे हैं। उनके हाथ में हमेशा एक छडी हुआ करती थी। तैयार होकर हाथ में छडी पकडी और मुझसे कहने लगे कि, चल तैयार हो, मेरे साथ चल। तेरा प्रोग्राम होना है। ऐसे ही एक दिन मैं चिंताग्रस्त होकर सोच रहा था कि अपने रियाज व परंपरा को आगे किस तरह बढाऊं। घर की स्थिति को देखते हुए मुझे नौकरी करनी पड रही थी। तभी लगा कि पिताजी मुझसे नौकरी छोडने के लिए कह रहे हैं। बस, उसी दिन ही मैंने नौकरी छोड दी और रियाज में जुट गया। स्वर्गीय पिता के आदेश का अनुकरण कर मेरे जीवन की दिशा ही बदल गई।
पद्म विभूषण से सम्मानित, जाने माने कत्थक गुरू नर्तक एवम् शास्त्रीय गायक पंडित बिरजू महाराज ने साक्षात्कार में अपने जीवन से जुड़ी बातों को लेकर चिर-परिचित अन्दाज़ में बेबाकी से बातचीत की। उन्होंने बताया कि उनके पिता श्री अच्छन महाराज कथक गुरु थे, अपने पुत्र के लिए भी उन्होंने यही सोच रखा था। लेकिन समय पर किसी का बस नहीं चलता। जब बिरजू महाराज केवल साढे नौ साल के थे तभी उनके पिता की मृत्यु हो गई। उनकी मां श्रीमती महादेई बेहद समझदार स्त्री थीं, उन्होंने पूर्वजों के गुणों, कला, परंपरा व ख्याति को अपने बच्चों को कहानियों में ढाल कर सुनाया। बिरजू महाराज को घर की जिम्मेदारी उठाने के लिए चौदह वर्ष की उम्र में ही नौकरी करनी पडी। उनका कहना था, कि मुझे नौकरी तो करनी पडी पर पिताजी की इच्छा हमेशा याद आती इसीलिए मैंने उनके आदेश से नौकरी छोडी और अभ्यास करने लगा। कोलकता में मैंने पहला नृत्य प्रदर्शन किया और कभी पीछे मुड कर नहीं देखा। अपने पिता की उम्मीदों पर मैं खरा नहीं उतरता, यदि उनके आदेश का पालन कर नौकरी न छोडता। जब आपके लिए निर्णय लेना मुश्किल हो या आप पसोपेश में पडे हों ऐसे में किसी का मार्गदर्शन आपके लिए बहुत मायने रखता है।
पंडित बृजमोहन नाथ मिश्र से बिरजू महाराज के सफर पर उन्होंने बताया कि यह किस्सा तो मेरी पैदाइश से जुड़ा हुआ है। मेरा जन्म 4 फरवरी, 1938 को लखनऊ में हुआ था। अस्पताल के जिस कमरे में मेरा जन्म हुआ था, वहां मुझे छोड़कर सिर्फ लड़कियां ही पैदा हुई थीं। गोपियों के बीच अकेला बृजमोहन ही होता है, इसलिए मुझे यह नाम मिला। प्यार से लोग मुझे बिरजू कहते थे, बाद में मैं इसी नाम से प्रसिद्घ हो गया।
अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि के बारे में चर्चा करते हुए पर उन्होंने बताया कि हम लोग लखनऊ के रहने वाले हैं, लेकिन बीते 47 वर्षो से मैं दिल्ली में रह रहा हूं। सात पीढि़यों से हमारा परिवार कथक को समर्पित रहा है। मैं तीन बहनों में अकेला भाई हूं। मेरे पिता और चाचा भी मशहूर कथक नर्तक थे। मैं अम्मा से सुना करता था कि हमारा खानदान बहुत अमीर था। घर में नौकर-चाकर, हाथी-घोड़े, तमाम सिपाही थे, लेकिन मैंने अमीरी नहीं देखी। जीवन के शुरुआती दौर में काफी संघर्ष किया है। मेरे पास एक रॉबिनहुड साइकिल थी। उसे मैंने आज भी बहुत संभालकर रखा है। जीवन में दुख न हो, तो सुख का अनुभव फीका लगता है। दुख झेलते हुए जब आदमी उससे बाहर आता है, तो आनंद की अनुभूति होती है।
बचपन में पतंग उड़ाने का शौक करने करने वाले बिरजू महाराज की नृत्य के प्रति आपकी रुचि कैसे जागृत हुई ? पर उन्होंने मुस्कराते हुए बताया कि 'तुम्हारे दादा को कथक नृत्य में पुरस्कारस्वरूप हाथी और चांदी के सिक्कों से भरी छह डोलियां मिली थीं', इस तरह की कहानियां लोग सुनाया करते थे। उन्हीं से मुझे प्रेरणा मिली कि मैं भी कुछ ऐसा करूं, जिससे परिवार का नाम रोशन हो सके। हमारे घर में 50 विद्यार्थी नृत्य सीखते थे। जब वे लोग तालीमखाने में रियाज करते, तो मैं वहा चला जाता और नृत्य देखा करता था। वहां से देखकर मैं रसोई में जाकर अम्मा को भी नाच के दिखाता और कहता था कि देखो अम्मा, मैंने नृत्य सीख लिया है। अम्मा कहतीं कि पहले बड़े तो हो जाओ, फिर नाचना। आज भी मैं इसको साधना और पूजा समझता हूं। यही नहीं हमारे यहां लखनवी तौर-तरीके की परंपरा को मैने तोड़ा और अपनी सबसे छोटी बेटी को नृत्य सिखाया है।
आज की फिल्मों में शास्त्रीय नृत्य को लेकर हो रहे प्रयोगों पर बेबाकी से अपना जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि पहले फिल्मों में नृत्य और गायन की बात ही अलग थी। आजकल शोर-शराबे के अलावा कुछ नहीं रह गया। शास्त्रीय नृत्य की आखिरी कड़ी माधुरी दीक्षित रही हैं। संजय लीला भंसाली की फिल्म देवदास में उन्होंने बहुत अच्छा काम किया था। जब फिल्मों की बात चल निकली तो मैने उनके पसंदीदा हीरो-हीरोइन के बारे में भी पूछ लिया। उनका कहना था कि पहले मुझे वहीदा रहमान, मीना कुमारी, वैजयंती माला और कुमकुम अच्छी लगती थीं। लखनऊ में कुमकुम हमारे पड़ोस में रहती थी। बचपन में हम दोनों एक ही साथ खेलते थे और गाना भी सीखते थे। फिलहाल मुझे रानी मुखर्जी, काजल और माधुरी दीक्षित पसंद हैं। हीरो में अनिल कपूर और गोविंदा अच्छे लगते हैं। गोविंदा डांस अच्छा करते हैं।
कथक के अलावा अन्य रुचि पर उन्होंने कहा कि मैं सिंगर रहा हूं। पखावज, वायलिन और सितार भी बजाता हूं। बैले में भी काफी रुचि है। पेंटिंग भी करता हूं। पेंटिंग की बात से याद आया कि बचपन में कोयले से दीवारें गंदी करता था और अम्मा से खूब डांट खाता था। मैं कविता और ठुमरी भी लिखता हूं।
 कत्थक की प्रस्तुति के दौरान कोई मजेदार घटना  पर उन्होंने रोचक अन्दाज में बताया कि एक बार मैं अमेरिका गया था। वहां एक बहुत बड़े स्टेडियम में मुझे परफार्म करना था। स्टेडियम के चारों तरफ दर्शक बैठे हुए थे, इसलिए मुझे चारों तरफ घूमना पड़ता था। जब मैं बाईं तरफ घूमता, तब मेरे शिष्य बाईं तरफ घूम जाते थे और जब मैं दाईं तरफ घूमता, तो वे लोग दाईं तरफ घूम जाते थे। इससे मुझे हंसी भी आ रही थी। यह प्रोग्राम काफी सफल हुआ था।

1 टिप्पणी:

  1. आपने ऐतिहासिक पलों को पूरी संवेदना से जिया, बधाई.

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